Kolkata:[1/24, 10:29] V K Sharma: कर्पूरी ठाकुर ने बिहार और उत्तर भारत की राजनीति में ऐसी लकीर खींच दी है, जिसे छोटा कर पाना किसी के लिए संभव नहीं हुआ. गरीबों और वंचितों के लिए उन्होंने जो किया, वह एक अप्रतिम मिसाल है.
पूरे उत्तर भारत में कर्पूरी ठाकुर (1921-1988) एक ऐसे समाजवादी नेता के रूप में याद किये जाते हैं, जिनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नही था. उनकी सादगी और ईमानदारी का लोहा उनके राजनीतिक विरोधी भी मानते थे. जो लोग राजसत्ता में होते हैं, मंत्री-मुख्यमंत्री बन जाते हैं, वे प्रायः जनता से दूर हो जाया करते हैं, लेकिन कर्पूरी ठाकुर अपवाद थे. वह हरदम भीड़ से घिरे होते थे. उन्हें भीड़ का आदमी कहा जाता था.

आज जिस सामाजिक न्याय की चर्चा पूरे देश में हो रही है, उसे उत्तर भारत में विकसित करने का श्रेय कर्पूरी ठाकुर को जाता है. दक्षिण भारत में जो महत्व पेरियार रामसामी नायकर और अन्ना दुरै का है, कुछ वैसा ही महत्व उत्तर भारत में राममनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर का है. कर्पूरी ठाकुर उत्तर भारत के अन्ना दुरै थे. समाजवादी राजनीति और चेतना को बिहार जैसे अर्द्धसामंती और पिछड़े प्रान्त में उन्होंने जमीं पर उतारा. यह चुनौती भरा कार्य था. लेकिन इसे उन्होंने संभव बनाया था.

उनका जन्म एक गरीब पिछड़े नाई परिवार में हुआ. मुश्किलों के बीच पढ़ाई हुई और फिर पढ़ाई छोड़कर वह स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े. उनका सूबा बिहार स्वाधीनता आंदोलन के साथ अन्य कई तरह के आंदोलनों का केंद्र था. स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किसानों का मुक्ति संघर्ष चल रहा था, तो पिछड़े वर्गों का त्रिवेणी संघ अभियान भी जारी था. 1934 में पटना में ही जयप्रकाश नारायण के प्रयासों से कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की गई थी. 1939 में इस सूबे में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की भी स्थापना हो गई थी. ऐसे में स्वाभाविक था कर्पूरीजी वन्दे मातरम छाप स्वाधीनता आंदोलन से न जुड़कर, उद्देश्यपूर्ण समाजवादी समझ वाली आज़ादी की लड़ाई से जुड़े. उनके राजनैतिक संघर्ष का लक्ष्य समाजवादी समाज की स्थापना था.

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