आजाद हिंद फौज के संस्थापक महानायक सुभाष चंद्र बोस का देश की आजादी के इतिहास में अतुलनीय और अनुपम योगदान है। 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में उनका जन्म हुआ था। बचपन से ही सुभाष का झुकाव अध्यात्म की ओर था। कटक में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के प​श्चात उन्होंने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज और कैंब्रिज विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की।

स्काटिश चर्च कॉलेज से उन्होंने दर्शन शास्त्र में स्नातक की शिक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्होंने मिलिट्री प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। उनके पिताजी चाहते थे कि सुभाष इंग्लैंड जाएं और वहां से सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा आईसीएस बनकर लौटें। उन्होंने न चाहते हुए भी पिता की इच्छा का पालन किया और इंग्लैंड जाकर आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली, किंतु उनकी सरकारी नौकरी करने की इच्छा बिल्कुल नहीं थी। 22 अप्रैल 1922 को उन्होंने पिता की इच्छा के विरुद्ध आईसीएस की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।

बंगाल के देशभक्त चितरंजन दास की प्रेरणा से सुभाष सियासत में आए। वे उनकी सेना में वालंटियर बन गए। फिर राष्ट्रीय विद्यापीठ के आचार्य और कांग्रेस स्वयंसेवक दल के प्रमुख बनाए गए। उन्होंने उत्तर बंगाल के बाढ़ पीड़ितों की अद्भुत सेवा की। स्वराज पार्टी के प्रमुख पत्र स्वराज के संपादक बनाए गए। 1924 में जब देशबंधु कलकत्ता के मेयर बने, तब सुभाष को मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया गया। इस दौरान प्रिंस आफ वेल्स के स्वागत के बहिष्कार के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया। यहीं से उनकी जेल यात्राएं शुरू हुईं, जोकि सन् 1941 तक तब तक चलती रहीं, जब तक वे चुपके से निकलकर जर्मनी चले नहीं गए। वे कुल 11 बार गिरफ्तार किए गए और लगभग 15 वर्षों तक जेल में रहे।

सुभाष बाबू 1928 में प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। लगातार परिश्रम से वे बीमार पड़ गए। बमुश्किल 1932 में चिकित्सा के लिए जर्मनी गए और वहां से लौटने पर 1939 में पट्टाभी सीतारमैया को चुनाव में पराजित कर पुन: कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए। महात्मा गांधी के अहिंसावादी विचारों का सुभाष के क्रांतिकारी विचारों से मेल नहीं होता था। अत: कांग्रेस से मतभेद बढ़ते गए और और उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। भारतीय संस्कारों से युक्त पूर्ण स्वराज का लक्ष्य लेकर उन्होंने फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। गांधी के व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारंभ करने के दौरान सुभाष बाबू ने बंगाली जनता को हालवेल, ब्लैकहोल स्मारक को हटा देने और आंदोलन करने का आह्वान किया। परिणामस्वरूप आंदोलन के लिए उमड़ते तूफान की आशंका के डर से सुभाष को पुन: जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया। वहां उनके भूख हड़ताल शुरू करने पर उन्हें छोड़ दिया गया, किन्तु उन्हें उनके घर में ही नजरबंद कर दिया गया।

26 जनवरी 1941 को वे वेश बदलकर गूंगे बहरे पठान जियाउद्दीन मौलवी के रूप में विषम परिस्थितियों और भयानक खतरों का सामना करते हुए काबुल होते हुए इटली से जर्मनी पहुंच गए, जहां उन्हें शाही मेहमान के रूप में नवाजा गया। वहां से वे जापान पहुंचे, जहां इंडियन इंडिपेंडेंट लीग के संस्थापक और गदर पार्टी के क्रांतिकारी रास बिहारी बोस से मिले और जापान में रहकर आजाद हिंद फौज का गठन किया। तदुपरांत उन्होंने ब्रिटेन और अमेरिका के खिलाफ युद्ध लड़ना प्रारंभ कर दिया।

21 अक्टूबर 1943 को अंतत: सिंगापुर में आजाद भारत की अस्थाई सरकार की घोषणा कर दी गई है। सुभाष के दिल्ली चलो और ‘जय हिंद’ के बुलंद नारों में जादू सा प्रभाव डाला, किंतु अचानक विश्व युद्ध का रुख बदल गया। ब्रिटेन और मित्र राष्ट्रों ने विजय प्राप्त कर ली। हिटलर की खुदकुशी और जर्मनी की हार से आजाद हिंद फौज की लड़ाई प्रभावित हुई। हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका द्वारा बम गिराए जाने पर जापान ने भी सरेंडर कर दिया। 23 अगस्त 1945 को अचानक जापान के टोक्यो न्यूज एजेंसी ने यह अविश्वसनीय खबर प्रसारित की कि 18 अगस्त को सुभाष चंद बोस हवाई जहाज की दुर्घटना में काल कवलित हो गए। हालांकि, आज भी उनके अवसान को लेकर रहस्य बना हुआ है। निस्संदेह, सुभाष चंद्र बोस के लिए भारत की आजादी अपने प्राणों से अधिक प्यारी थी। किंतु वे अखंड भारत की आजादी के प्रबल समर्थक थे। वे भारत के मुक्ति संग्राम के ऐसे अपराजेय योद्धा हैं, जो सदियों तक हमारे प्रेरणा पुंज बनकर राष्ट्र की बलिवेदी पर अपने प्राणों को उत्सर्ग करने की प्रेरणा देते रहेंगे।

इंडिया गेट के पास लगेगी नेताजी की मूर्ति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि इंडिया गेट पर अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा लगाई जाएगी। हालांकि इस ऐलान के बाद लोग यही समझ रहे हैं कि बोस की प्रतिमा इंडिया गेट पर लगेगी, जबकि ऐसा नहीं है। ये प्रतिमा इंडिया गेट के पास एक छतरी में लगाई जाएगी। इस छतरी का एक फोटो भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ट्वीट में साझा किया है। दिल्ली में जहां इंडिया गेट बना है, वहां आसपास एक बड़ा सा पार्क है। इस पार्क में ही ये छतरी बनी है, जो इंडिया गेट के सामने है। इसी जगह पर बोस की प्रतिमा लगाई जाएगी, लेकिन इससे पहले जान लेते हैं कि आखिर इस जगह पर पहले किसकी प्रतिमा लगी थी।

दरअसल जब इंडिया गेट बनकर तैयार हुआ था तब इसके सामने जार्ज पंचम की एक मूर्ति लगी हुई थी। इसे बाद में ब्रिटिश राज के समय की अन्य मूर्तियों के साथ कोरोनेशन पार्क में स्थापित कर दिया गया था। यह 1960 के दशक तक यहां लगी थी और 1968 में इसे यहां से भी हटाया गया था। अब जार्ज पंचम की मूर्ति की जगह प्रतीक के रूप में केवल एक छतरी भर रह गई

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